नेता, अफसर और ठेकेदारों के गिरोह ने छीना अबूझमाड़ियों का हक़

कमीशन के झगड़े में उलझा अबूझमाड़ियों का आशियाना
सरकारी जलसों के शोर में गुम हो गई अबूझमाड़ियों की आवाज़
केंद्र सरकार द्वारा पीवीटीजी के लिए स्वीकृत किये गए थे 532 लाख रूपये के 213 आवास
तीन साल बीत गए अब तक शुरू नहीं हो सका काम
नेताओ अफसरों और ठेकेदारों के कमीशन में खर्च हो गयी पहली किस्त
आदिवासियों की मज़दूरी तक खा गए ठेकेदार
अबूझमाड़ से लौटकर
देवशरण तिवारी

जगदलपुर (हाईवे चैनल)बदलता बस्तर,नक्सलवाद मुक्त बस्तर जैसे कई नारे इन दिनों बस्तर ही नहीं बल्कि पूरे देश की फ़िज़ाओं में गूँज रहे हैं। ऐसे नारे सुन कर बस्तर की खनिज सम्पदा पर गिद्ध दृष्टि जमाये बैठे खनन कंपनियों के मालिक तो बहुत खुश हैं लेकिन इस अकूत सम्पदा के वास्तविक मालिक याने आदिवासी कह रहे हैं कि उन्हें कुछ भी बदलता हुआ नज़र नहीं आ रहा है। यहां बात बस्तर के अत्यंत पिछड़े और संरक्षित आदिवासियों की हो रही है जिन्हें अबूझमाड़िया के नाम से दुनिया भर में जाना जाता है। छत्तीसगढ़ के नारायणपुर का अबूझमाड़ इलाका हमेशा से सुर्खियों में रहा है। यहाँ की अनोखी, सदियों पुरानी अबूझमाड़िया संस्कृति, खूबसूरत वादियाँ और घोटुल के साथ इसे माओवादियों की राजधानी के रूप में भी जाना जाता रहा है।

नक्सलवाद पर काबू पाने सबसे पहले यहां तक पहुँचने के लिए सड़क बननी शुरू हुई।पल्ली-बारसूर सड़क के साथ अबूझमाड़ के प्रमुख गाँव ओरछा तक सड़क पहुँच गई। तब लोगों को लगा कि सड़क बन गई है तो विकास नाम की कोई चीज भी ओरछा तक पहुंचेगी,लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्यों कि ये सड़क विकास पहुँचाने के लिए नहीं बल्कि नीको जायसवाल नाम की खनन कंपनी को, छोटे डोंगर की आमदई पहाड़ी तक पहुँचाने के लिए बनी थी। हुआ वही जिसका अंदेशा था माइनिंग कंपनी रोज़ाना करीब 10 हज़ार टन लोहा खोद कर रोज़ाना करोड़ों रूपये अपने घर ले जा रही है और अबूझमाड़िया अपने ढाई लाख की उस झोपड़ी के लिए तरस रहे हैं जिसे भारत सरकार ने आज से तीन साल पहले उनके लिए भेजी थी।
दरअसल मामला यह है कि भारत सरकार के केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय ने प्रदेश के विशेष रूप से कमजोर पांच जनजाति समूहों के हितग्राहियों के लिए कुल 1704 मकान स्वीकृत किये थे। वित्तीय वर्ष 2022-23 में स्वीकृत इस कार्य में छत्तीसगढ़ के बैगा, पहाड़ी कोरवा, बिरहोर, कमार और अबूझमाड़िया परिवारों को लाभान्वित किया जाना था। जिन्हें पीवीटीजी अर्थात विशेष रूप से कमजोर जनजाति समूहों के रूप में जाना जाता है।

नारायणपुर के कुल 213 अबूझमाड़िया परिवारों के लिए ढाई-ढाई लाख रूपये के मान से 532.50 रूपये स्वीकृत कर राशि भी आबंटित कर दी गई ।बस फिर क्या था नेता, अफसर और ठेकेदारों का गिरोह फिर सक्रिय हो गया। अबूझमाड़ियों से बरसों से उनके मुँह का निवाला छीनने वाले इस गिरोह ने इस बार उनका घर भी छीन लिया। कमीशन की लालच में पहले बिना टेंडर किये सारे काम एक पंचायत सचिव के भाई और दोस्तों को सौंप दिए गए।फिर नेता और अफसरों में कमीशन के बंटवारे के बाद आधी दर पर काम पेटी ठेकेदारों को दे दिया गया। पेटी ठेकेदार ने आदिवासियों को सूचना दी कि आपके नाम से मकान स्वीकृत हुआ है।

सभी से कहा गया कि अपने-अपने मकान की नींव खोदें और 25-25 बोरी सीमेंट के साथ कुछ ईंट भी ले आएं। सभी ने अपने पैसों से सारा सामान खरीदा लेकिन दो साल बाद भी निर्माण शुरू नहीं हो सका ।नींव खोदने की मजदूरी नहीं मिली सीमेंट रखे रखे खराब हो गया, दिल्ली से आया पैसा नेता अफसर और ठेकेदारों के बीच बंट गया और अबूझमाड़िया फिर एक बार भ्रष्ट सिस्टम का शिकार हो गया।

प्रथम चरण में अबूझमाड़ के ओरछा,बागडोँगारी, करलखा,कोहकामेटा, आदेर, और कुंदला में कुल 54 अबूझमाड़िया परिवारों के लिए मकान स्वीकृत किये गए। सीधे हितग्राहियों या पंचायतों को राशि देने की जगह पंचायत सचिव कार्तिक नंदी के भाई गणेश नंदी, विधान माल, प्रवीण जैन और सोनी सप्लायर को यह काम सौंप दिया गया। फिर इन व्यक्तियों द्वारा यह काम पेटी ठेकेदारों को कम दरों पर थमा दिया गया।नतीजा यह हुआ कि काम शुरू ही नहीं हो सका। हितग्राहियों से कहा गया कि वे अपने अपने मकानों की नींव खोदें और सीमेंट आदि सामग्री खरीद लें जिसका उन्हें भुगतान कर दिया जायेगा। हितग्राहियों ने अपना काम कर दिया लेकिन मकान बनना तो दूर उनके द्वारा खरीदा गया सीमेंट पड़े पड़े खराब हो गया और आज तक उन्हें उनके द्वारा किये गए कामों की मजदूरी भी नहीं दी गयी।

एक सरपंच और एक जिला पंचायत सदस्य भी हुए भ्रष्टाचार के शिकार

आम अबूझमाड़िया के साथ साथ ग्राम पंचायत गोमे की सरपंच सोमी कचलाम और ओरछा में रहने वाले नारायणपुर जिला पंचायत के सदस्य तक इस भ्रष्ट सिस्टम से बच नहीं सके। सरपंच के पति सुखदेव कचलाम ने बताया कि नींव खोदने का काम उन्होंने भी कर लिया सीमेंट भी खरीदा जो अब खराब हो गया है मकान बनना तो दूर मजदूरी भी नहीं मिली। जिला पंचायत सदस्य गुड्डू उसेंडी की कहानी भी बाकी हितग्राहियों जैसी ही है।उनसे भी सीमेंट आदि निर्माण सामग्री खरीदवाई गई, मज़दूरी करवाई गई लेकिन मकान नहीं बन सका। यहां के विधायक और मंत्री केदार कश्यप,कलेक्टर, जिला पंचायत सीईओ से भी शिकायत की गयी लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

पति की माओवादियों ने कर दी थी हत्या, बेवा मकान के लिए भटक रही

गोमे पंचायत के आश्रित ग्राम बोगान की रहने वाली जानकी का भी नाम मकान पाने वाले लोगों में शामिल है। कुछ वर्षों पहले माओवादियों ने इनके पति की हत्या कर दी थी। इनके चार छोटे बच्चे हैं। जानकी का घर टूटा फूटा है बड़ी मुश्किल से वे अपने बच्चों को पढ़ा रही हैं। उन्होंने भी अपने बच्चों के साथ मिलकर मकान की नींव खोदी जिस पर आज तक दीवार खड़ी नहीं हो सकी। इन्हें भी उनके द्वारा की गई मजदूरी का भुगतान नहीं किया गया।
सचिव कार्तिक नंदी ने बांटे थे पेटी ठेकेदारों को काम

गोमे पंचायत में 12 मकानों का निर्माण कर रहे पेटी ठेकेदार जयलाल नुरेटी ने बताया कि उन्हें यह काम पंचायत सचिव कार्तिक नंदी ने दिया है। 12 आवास बनाने के लिए उन्हें कार्तिक नंदी द्वारा मात्र पांच लाख रुपये दिए गए। उन्होंने स्वीकार किया कि गोमे पंचायत के बोगान गाँव के हितग्राहियों के मकान नहीं बन सके हैं और उन्हें किये गए काम के बदले मजदूरी का भुगतान भी नहीं किया जा सका है।इस पूरे मामले का सूत्रधार पंचायत सचिव कार्तिक नंदी को बताया जा रहा है। इन्हें करोड़पति सचिव के नाम से भी जाना जाता है। कार्तिक नंदी पंचायत सचिव संघ के अध्यक्ष भी हैँ। वे खुद को यहां के विधायक और वन मंत्री केदार कश्यप का ख़ास बताते हैँ। इस लिए यहां के अधिकारी इन पर कोई कार्रवाई करने से कतरा रहे हैँ।
कई लोगों के काम शुरू ही नहीं हो सके हैं -पंचायत सचिव

ग्राम पंचायत गोमे के सचिव सरादू राम भंडारी ने स्वीकार किया कि उनकी पंचायत में भी 14 आवास बनाये जाने थे। आधे मकानों की सिर्फ नींव खोदी गई है और कई हितग्राहियों के काम शुरू ही नहीं हो सके हैं। उनके पास हितग्राही शिकायत लेकर आये थे उन्हें बताया गया है की यह काम जनपद पंचायत का नहीं है इस काम के लिए कार्य एजेंसी सहायक आयुक्त आदिवासी विकास को बनाया गया है।
ठेकेदारों को फायदा पहुँचाने इलेक्ट्रिकल फिटिंग को प्लान से हटाया।
काम क्यों रुका है पता करता हूं -सहायक आयुक्त आदिवासी विभाग नारायणपुर
प्रदेश के बाकी जिलों में इसी लागत में विद्युतिकरण के साथ पीवीटीजी के आवास बनाये गए हैं। अबूझमाड़ के आवासों के निर्माण में ठेकेदारों को लाभ पहुँचाने के उद्देश्य से विद्युतीकरण का प्रावधान हटा लिया गया है।सहायक आयुक्त राजेंद्र सिंह ने कहा कि अबूझमाड़िया जनजाति की जीवन शैली को ध्यान में रखते हुए उनके मकानों में विद्युतिकरण का प्रावधान नहीं किया गया है। उन्होंने स्वीकार किया की काम रुका हुआ है।काम किस वजह से शुरू नहीं हो सका है इस बात कि जानकारी उन्हें नहीं है।
अबूझमाडिया परिवारों की यह हालत देख कर एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि जिस देश के राष्ट्रपति, जिस प्रदेश के मुख्यमंत्री, जिस विधानसभा क्षेत्र के विधायक ऊपर से मंत्री भी,सभी आदिवासी हैं इसके बावजूद भी इन संरक्षित अबूझमाड़िया जनजाति के लोगों के साथ हो रहे अन्याय की कहानियों का ये सिलसिला ख़त्म क्यों नहीं हो रहा है।





