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मत्स्य पालन से समृद्ध हो रही सरगुजा की ग्रामीण अर्थव्यवस्था, किसानों और महिलाओं के लिए खुल रहे स्वरोजगार के नए अवसर….

रायपुर: छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में अब खेतों और तालाबों के साथ आजीविका डबरियां, जलाशय और अमृत सरोवर भी किसानों तथा ग्रामीण परिवारों की आर्थिक समृद्धि का माध्यम बन रहे हैं। खेती और पशुपालन के साथ मत्स्य पालन को अपनाकर ग्रामीण परिवार अपनी आय के स्रोत बढ़ा रहे हैं। सरगुजा जिले में शासन की विभिन्न योजनाओं, मत्स्य पालन विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन और स्थानीय जल संसाधनों के बेहतर उपयोग से आजीविका के नए अवसर विकसित हो रहे हैं। कहीं मछुआरा सहकारी समितियों के सैकड़ों सदस्य सामूहिक मत्स्य पालन से अपने परिवारों का भरण-पोषण कर रहे हैं, तो कहीं किसान डबरी में मछली पालन के साथ सब्जी उत्पादन और सिंचाई का लाभ उठा रहे हैं। वहीं स्व-सहायता समूहों की महिलाएं अमृत सरोवरों में मछली पालन कर आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में ग्रामीण आजीविका को मजबूत बनाने और स्वरोजगार के अवसरों का विस्तार करने की दिशा में विभिन्न योजनाओं के माध्यम से प्रयास किए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत मिलने वाली अनुदान सहायता और विभागीय मार्गदर्शन से मत्स्य पालन को व्यवसाय के रूप में अपनाने के अवसर बढ़ रहे हैं। सरगुजा जिले में पारंपरिक जलाशयों से लेकर आधुनिक बायोफ्लॉक तकनीक तक मत्स्य पालन के विविध स्वरूप सामने आ रहे हैं। इन प्रयासों की विशेषता यह है कि ग्रामीण परिवार उपलब्ध भूमि और जल संसाधनों का उपयोग एक से अधिक आजीविका गतिविधियों के लिए कर रहे हैं।

जलाशयों, आजीविका डबरियों और अमृत सरोवरों से बढ़ रही ग्रामीण परिवारों की आय, आधुनिक बायोफ्लॉक तकनीक से मत्स्य पालन को मिल रहा नया आयाम

घुनघुट्टा जलाशय बना 381 मछुआरों की आजीविका का आधार

सरगुजा जिले का घुनघुट्टा जलाशय सामूहिक मत्स्य पालन के माध्यम से ग्रामीण परिवारों को आजीविका उपलब्ध कराने का उदाहरण है। यहां आदिवासी मछुआ सहकारी समिति, कलगसा के 381 सदस्य मत्स्य पालन से जुड़े हुए हैं। समिति को जलाशय 10 वर्ष की अवधि के लिए पट्टे पर उपलब्ध कराया गया है, जिससे सदस्य संगठित रूप से मत्स्य उत्पादन की गतिविधियां संचालित कर रहे हैं। जलाशय में मछली पालन से जुड़े कार्य इन परिवारों के लिए आजीविका का महत्वपूर्ण साधन बने हुए हैं।

समिति के अध्यक्ष श्री राम बिलोच राम बताते हैं कि प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत मछली बीज के लिए 7 लाख 62 हजार रुपये की अनुदान सहायता मिलती है। इस सहयोग से जलाशय में मत्स्य उत्पादन की गतिविधियों को आगे बढ़ाने में मदद मिल रही है। सहकारी समिति के माध्यम से सामूहिक प्रयासों का लाभ बड़ी संख्या में मछुआरा परिवारों तक पहुंच रहा है। घुनघुट्टा जलाशय का यह उदाहरण दर्शाता है कि उपलब्ध जल संसाधनों का योजनाबद्ध उपयोग और सहकारी व्यवस्था ग्रामीण परिवारों के लिए स्थायी आजीविका के अवसर विकसित करने में सहायक हो सकती है।

आजीविका डबरियों से मछली पालन और खेती को दोहरा लाभ

ग्रामीण क्षेत्रों में निर्मित आजीविका डबरियां अब केवल वर्षा जल संरक्षण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि किसानों के लिए अतिरिक्त आय का माध्यम भी बन रही हैं। इन डबरियों में वर्षा जल का संचय कर किसान मछली पालन कर रहे हैं और आवश्यकता के अनुसार पानी का उपयोग सब्जी उत्पादन तथा फसलों की सिंचाई में भी कर रहे हैं। इससे एक ही संसाधन का उपयोग कई आर्थिक गतिविधियों के लिए संभव हो रहा है।

लखनपुर विकासखंड के किसान श्री शिवबालक ने अपनी आजीविका डबरी में कतला, रोहू, मृगल और ग्रास कार्प प्रजाति की मछलियों का पालन किया। उन्होंने लगभग दो क्विंटल मछली की बिक्री कर 20 से 25 हजार रुपये की आमदनी प्राप्त की। मछली पालन के साथ वे डबरी में संचित पानी का उपयोग सब्जी उत्पादन के लिए भी करते हैं। इस प्रकार डबरी उनके लिए जल संरक्षण, मत्स्य पालन और खेती को जोड़ने वाला उपयोगी संसाधन बन गई है।

जलाशयों, आजीविका डबरियों और अमृत सरोवरों से बढ़ रही ग्रामीण परिवारों की आय, आधुनिक बायोफ्लॉक तकनीक से मत्स्य पालन को मिल रहा नया आयाम

इसी तरह बतौली विकासखंड के किसान श्री लक्ष्मी प्रसाद ने डबरी में मछली पालन से लगभग एक लाख रुपये की आय अर्जित की है। उन्होंने करीब 20 क्विंटल मछली उत्पादन का आकलन किया है। डबरी में उपलब्ध पानी का उपयोग वे साग-सब्जी और गेहूं की सिंचाई के लिए भी कर रहे हैं। मत्स्य पालन से प्राप्त आय और सिंचाई की सुविधा ने उनके कृषि कार्यों को अतिरिक्त सहारा दिया है। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि जल संरक्षण के लिए विकसित संरचनाओं को आजीविका गतिविधियों से जोड़ने पर किसानों को अतिरिक्त आर्थिक अवसर मिल सकते हैं।

पहाड़ी कोरवा परिवार भी अपना रहे मछली पालन, डबरी की मेड़ों पर फलदार पौधों से अतिरिक्त आय की तैयारी

सरगुजा जिले में आजीविका डबरियों के माध्यम से मत्स्य पालन का विस्तार अन्य ग्रामीण परिवारों तक भी हो रहा है। अम्बिकापुर विकासखंड की श्रीमती जोशमनि एक्का के परिवार ने 2 लाख 99 हजार रुपये की लागत से निर्मित डबरी में मछली पालन शुरू किया है। वहीं लखनपुर विकासखंड के किसान श्री कनी लाल बड़ा ने अपनी डबरी में 9 किलोग्राम मछली बीज डालकर मत्स्य पालन को सब्जी उत्पादन से जोड़ा है। इन गतिविधियों से परिवारों को खेती के साथ अतिरिक्त आय अर्जित करने की संभावनाएं मिल रही हैं।

ग्राम लोसगी के पहाड़ी कोरवा किसान श्री ठिबुल राम ने भी आजीविका डबरी का बहुउद्देशीय उपयोग शुरू किया है। उन्होंने डबरी में 17 किलोग्राम मछली बीज डाला है। इसके साथ ही डबरी की मेड़ों पर अरहर, आम, मुनगा और नींबू के पौधे लगाए हैं। उनका प्रयास मछली पालन के साथ कृषि एवं बागवानी गतिविधियों को जोड़ने का उदाहरण है। मछलियों की बढ़वार और पौधों के विकसित होने के बाद इन गतिविधियों से परिवार को अतिरिक्त आय मिलने की संभावना है। इस प्रकार डबरी केवल जल संग्रहण की संरचना नहीं रहकर विविध आजीविका गतिविधियों का आधार बन रही है।

अमृत सरोवर में मछली पालन से महिलाओं को मिला स्वरोजगार का अवसर

सरगुजा जिले में स्व-सहायता समूहों की महिलाएं भी मत्स्य पालन के माध्यम से आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम बढ़ा रही हैं। बतौली विकासखंड की ग्राम पंचायत बिरीमकेला में ज्योति स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने अमृत सरोवर में सामूहिक रूप से मछली पालन शुरू किया है। समूह की सदस्य श्रीमती रजनी चौहान बताती हैं कि महिलाओं ने पहली बार लगभग 15 किलोग्राम मछली की बिक्री कर आमदनी प्राप्त की। इस शुरुआती सफलता से उत्साहित होकर समूह ने दोबारा मछली बीज डाला है और मत्स्य पालन की गतिविधि को आगे बढ़ाया है।

महिलाओं के लिए यह पहल केवल अतिरिक्त आय अर्जित करने का अवसर नहीं, बल्कि सामूहिक उद्यमिता की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है। समूह के माध्यम से काम करने पर महिलाएं मछली बीज संचयन, देखभाल, उत्पादन और बिक्री जैसी गतिविधियों में अपनी भागीदारी बढ़ा सकती हैं। अमृत सरोवर जैसे सामुदायिक जल संसाधनों का आजीविका के लिए उपयोग ग्रामीण महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने और आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की संभावनाएं विकसित कर रहा है।

बायोफ्लॉक तकनीक से सीमित स्थान में मत्स्य पालन की नई संभावनाएं

पारंपरिक तालाबों और जलाशयों के साथ आधुनिक बायोफ्लॉक तकनीक भी सरगुजा जिले में मत्स्य पालन के नए अवसर उपलब्ध करा रही है। इस तकनीक के माध्यम से सीमित स्थान में नियंत्रित परिस्थितियों के अंतर्गत मछली पालन किया जा सकता है। विशेष रूप से ऐसे हितग्राहियों के लिए यह पद्धति उपयोगी हो सकती है, जिनके पास बड़े तालाब उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन वे अपनी भूमि पर व्यावसायिक मत्स्य पालन शुरू करना चाहते हैं।

श्रीमती चंपा मंडल ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत 14 लाख रुपये की लागत से बायोफ्लॉक इकाई स्थापित की है। इसके लिए उन्हें 8 लाख 40 हजार रुपये का अनुदान प्राप्त हुआ। उनकी इकाई में लगभग चार माह से मछलियों का पालन किया जा रहा है और वे बिक्री की तैयारी कर रही हैं। उन्हें थोक बाजार में लगभग 120 रुपये प्रति किलोग्राम का भाव मिलने की उम्मीद है। हालांकि वास्तविक आय मछलियों के उत्पादन, बिक्री के समय मिलने वाले बाजार भाव और संचालन लागत पर निर्भर करेगी।

इसी प्रकार श्री विप्लब हलदर ने भी मत्स्य पालन विभाग के मार्गदर्शन से बायोफ्लॉक पद्धति अपनाई है। उनकी इकाई में मछलियां वर्तमान में बढ़वार की अवस्था में हैं और लगभग तीन माह बाद बिक्री योग्य होने की उम्मीद है। इन दोनों हितग्राहियों के प्रयास दर्शाते हैं कि तकनीकी मार्गदर्शन और योजनागत सहायता से ग्रामीण क्षेत्रों में आधुनिक मत्स्य पालन की संभावनाओं का विस्तार किया जा सकता है। बायोफ्लॉक तकनीक में पानी की गुणवत्ता, मछलियों के आहार, ऑक्सीजन की उपलब्धता और नियमित निगरानी का विशेष महत्व होता है, इसलिए वैज्ञानिक प्रबंधन इसकी सफलता के लिए आवश्यक है।

मछली उत्पादन के साथ परिवहन, विपणन और अन्य गतिविधियों में भी रोजगार की संभावनाएं

मत्स्य पालन का महत्व केवल मछली उत्पादन और बिक्री तक सीमित नहीं है। इस व्यवसाय से मछली बीज संचयन, आहार प्रबंधन, तालाबों की देखभाल, मछली पकड़ने, छंटाई, परिवहन और बाजार में बिक्री जैसी अनेक गतिविधियां जुड़ी होती हैं। इन कार्यों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अतिरिक्त अवसर विकसित हो सकते हैं। विशेष रूप से सहकारी समितियों और स्व-सहायता समूहों के माध्यम से मत्स्य पालन करने पर सामूहिक संसाधनों का बेहतर उपयोग और आय के अवसरों का विस्तार संभव है।

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत पात्र हितग्राहियों को निर्धारित प्रावधानों के अनुसार मिलने वाली अनुदान सहायता मत्स्य पालन इकाइयों की स्थापना में सहयोग प्रदान करती है। इसके साथ विभागीय प्रशिक्षण, गुणवत्तापूर्ण मछली बीज, उचित आहार, जल प्रबंधन और बाजार तक पहुंच भी महत्वपूर्ण है। मत्स्य पालन को लाभकारी व्यवसाय बनाने के लिए उत्पादन लागत और बिक्री से प्राप्त आय का सही आकलन आवश्यक है, क्योंकि कुल बिक्री राशि और वास्तविक शुद्ध लाभ अलग-अलग होते हैं। वैज्ञानिक पद्धतियों और बेहतर विपणन व्यवस्था से इस व्यवसाय की आर्थिक संभावनाओं को मजबूत किया जा सकता है।

जल संरक्षण और आजीविका का संगम, आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ते कदम

सरगुजा जिले में मत्स्य पालन से जुड़ी ये पहल ग्रामीण विकास की उस दिशा को सामने लाती हैं, जिसमें उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करते हुए उन्हें आजीविका से जोड़ा जा रहा है। घुनघुट्टा जलाशय में 381 मछुआरों की सामूहिक आजीविका, किसानों की डबरियों में मछली पालन के साथ सिंचाई और सब्जी उत्पादन, अमृत सरोवर में महिलाओं का सामूहिक स्वरोजगार तथा बायोफ्लॉक तकनीक से आधुनिक मत्स्य पालन के प्रयास इस बदलाव के अलग-अलग उदाहरण हैं।

इन गतिविधियों से ग्रामीण परिवारों को पारंपरिक कृषि कार्यों के अतिरिक्त आय के नए स्रोत विकसित करने का अवसर मिल रहा है। जल संरक्षण के लिए निर्मित संरचनाओं का उपयोग मत्स्य पालन और सिंचाई में होने से संसाधनों की उपयोगिता भी बढ़ रही है। वहीं स्व-सहायता समूहों और सहकारी समितियों की भागीदारी से सामूहिक उद्यमिता को प्रोत्साहन मिल रहा है।

सरगुजा के ग्रामीण परिवारों की ये कहानियां दर्शाती हैं कि शासन की योजनाओं, तकनीकी मार्गदर्शन और हितग्राहियों की मेहनत के समन्वय से मत्स्य पालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है। जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन, वैज्ञानिक मत्स्य पालन, प्रशिक्षण और बाजार सुविधाओं का विस्तार आने वाले समय में किसानों, मछुआरों और महिलाओं के लिए स्वरोजगार तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता के नए अवसर विकसित करने में सहायक होगा।

 

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