
आबकारी विभाग में स्थानांतरण आदेश बना मज़ाक
आबकारी उप निरीक्षक का बस्तर प्रेम बना चर्चा का विषय
ताबदले के ढाई महीने बाद भी नहीं ग्रहण किया पदभार
कई आरोपों से घिरे अधिकारी की फिर हो रही बस्तर वापसी
जगदलपुर।(हाईवे चैनल) बस्तर में पदस्थ एक आबकारी उप निरीक्षक को बस्तर इतना भा गया कि वे सरकार के स्थानंतरण आदेश को भी चुनौती देते नज़र आ रहे हैं। पहले ही कई विवादों में घिरे उप निरीक्षक अंकित राठौर का स्थानांतरण 22 जून को बस्तर से खैरागढ़ कर दिया गया है। दूसरे ही दिन उन्हें यहाँ अर्थात बस्तर से भारमुक्त कर दिया गया था ।आज 85 दिनों के बाद भी बस्तर में बस चुके उप निरीक्षक नें खैरागढ़ जिले की नयी पदस्थापना को स्वीकार नहीं किया है। अपने स्थानंतरण से रूठे ये अधिकारी जगदलपुर में बैठकर संदिग्ध मेडिकल ग्राउंड पर समय गुज़ार रहे हैं। एक भाजपा नेता के विशेष कृपापात्र यह विवादास्पद अधिकारी दिन रात अपना स्थानांतरण रुकवाने के सभी तारीकों पर काम कर रहे है।खबर यह भी है कि वे इस काम में सफल भी हो चुके हैं।
बस्तर में फिलहाल आबकारी उप निरिक्षकों की पर्याप्त संख्या है लेकिन इसके बावजूद वे बस्तर में ही शासन की मंशा के विपरीत डंटे रहना चाह रहे हैं।सवाल यह नहीं कि किसी कर्मचारी को मेडिकल अवकाश लेने का अधिकार है या नहीं सवाल यह है कि अवकाश की वास्तविक स्थिति क्या है और उसके बाद जॉइनिंग कब होगी।क्या मेडिकल अवकाश विधिवत स्वीकृत है क्या खैरागढ़ में जॉइनिंग रिपोर्ट प्रस्तुत की गई यदि नहीं, तो अब तक उनकी सेवा स्थिति क्या है ये कुछ गंभीर सवाल हैं जो आबकारी विभाग की कार्य प्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं ।

स्थानांतरण आदेश के बाद नियमानुसार निर्धारित समय-सीमा के भीतर नवीन पदस्थापना स्थल पर उपस्थित होकर कार्यभार ग्रहण किया जाना चाहिए। तबादला आदेश जारी हुए तीन महीने होने को हैं इसके बावजूद भी अंकित राठौर खैरागढ़ नहीं पहुंचे हैं और अभी भी उनके द्वारा जिला बस्तर में ही बने रहने के प्रयास किए जा रहे हैं।सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक अधिकारी इतने लंबे समय तक तबादला आदेश के बाद भी नए पदस्थापना स्थल पर कार्यभार ग्रहण किए बिना कैसे रह सकता है।यदि विभागीय नियमों के अनुसार 15 दिवस के भीतर कार्यभार ग्रहण किया जाना अपेक्षित है, तो फिर इस मामले में अब तक क्या कार्रवाई हुई।खैरागढ़ में आबकारी विभाग के मैदानी कार्यों और विभागीय व्यवस्थाओं को देखते हुए आबकारी सब इंस्पेक्टर की आवश्यकता भी बताई जा रही है। ऐसे में नियुक्ति के बावजूद अधिकारी का कार्यभार संभालने नहीं पहुंचना विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है।

आखिर बस्तर में ऐसा क्या है कि तबादले के बाद भी उक्त अधिकारी बस्तर से हिलना भी नहीं चाहते। जबकि इन पर पहले ही कई गंभीर आरोप लग चुके हैं,जैसे प्रिंट रेट से अधिक दरों पर शराब की बिक्री कराना,चखना सेंटर का स्वयं किसी अन्य नाम से संचालन करना, शहर में संचालित हो रहे बारों के लायसेंस नवीनीकरण और नये लायसेंस जारी करने के लिए तैयार किये गए निरीक्षण प्रतिवेदनों में रिश्वत लेकर गलत जानकारी प्रस्तुत करना। इतना ही नहीं अन्य प्रदेशों की अवैध शराब बस्तर में बेच रहे तस्करों का एक विडिओ भी चर्चा में है जिसमे तस्कर यह कहते सुने जा सकते हैं कि उनका यह व्यापार किस अधिकारी के संरक्षण में चल रहा है और इसके बदले उन्हें हर महीने कितने रुपयों की रिश्वत दी जा रही है।ऐसे में उनकी दोबारा बस्तर वापसी यह साबित करेगी कि जो स्थानीय नेता और शराब माफिया इन्हें बस्तर में बनाये रखना चाहते हैं उनके लिए ये कमाऊ उप निरीक्षक क्यों और कितने ज़रूरी हैं।





